देश की उन्नति के पक्ष में ------
१. स्थानीय निवासियों के जीवन को बेहतरीन बनाने और उन्हें विकास के समुचित अवसरों का लाभ उपलब्ध करवाने हेतु छोटे राज्यों का राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढ़ांचा अधिक अनुकूल होता है.
२. क्षेत्रीय संसाधनों का दक्षतापूर्वक एवं न्यायपूर्ण ढंग से इस तरह प्रयोग सुनिश्चित करना कि अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों एवं अनूसूचित जातियों/जनजातियों/आदिवासियों का अधिकतम दक्ष तरीके से विकास संभव हो पाए.
३. हमारे संविधान में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की जो परिकल्पना प्रस्तुत की गई है उसे यथार्थ के फलक पर अवतरित करने हेतु छोटे राज्य अधिक उपयुक्त रहते हैं. कहा भी जाता है-----''छोटा परिवार....सुखी परिवार'' हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी एक प्रसिद्ध उक्ति है----''दीर्घ सूत्रम शीघ्रम विनश्यति'' अर्थात लम्बी काया का क्षरण जल्दी हो जाता है. स्पष्ट होता है कि प्राचीन युग के ऋषि-मुनियों से लेकर वर्तमान वैज्ञानिक युग के दार्शनिक तक छोटी संरचना पर अधिक बल देते हैं जो छोटे राज्यों के निर्माण के पक्ष में एक महत्वपूर्ण तर्क के रूप में निरुपित किया जा सकता है.
४. भारत के संविधान में संघीय ढांचा अपनाया गया है जो एक साथ केंद्र व अनेक राज्यों वाली प्रशासनिक संरचनाओं की व्यवस्था करता है. संविधान की ७ वीं अनुसूची में संघ एवं राज्य के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है. भारत का संविधान केंद्र एवं राज्यों के बीच टकराव नहीं बल्कि सहयोग की बुनियाद पर टिका हुआ है. नए/छोटे राज्यों के निर्माते तो नए राज्यों के निर्माण हेतु प्रावधान ही क्यों रखते?? वो तत्कालीन समय उपस्थित राज्यों की संख्या कोण से सहयोग की संवैधानिक व्यवस्था घायल नहीं हो सकती क्योंकि इसके लिए हमारे संविधान में पर्याप्त उपाय किये गए हैं.
५. भारत के संविधान में नए/छोटे राज्यों के निर्माण की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई है. यदि हमारे विद्द्वान संविधान निर्माता नए राज्यों के गठन को अनुचित मान स्थिर भी तो रख सकते थे...अब प्रश्न उठता है आखिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? न सिर्फ नए राज्यों के निर्माण का प्रावधान संविधान में रखा बल्कि नए राज्य गठन की प्रक्रिया भी अति सरलीकृत बनाई गई..इसके लिए न तो किसी तरह के संविधान संशोधन की आवश्यकता होती है और न ही संसद के विशेष बहुमत की....स्पष्ट होता है कि हमारे संविधान निर्माता नए राज्यों को लेकर तनिक मात्र भी संशय नहीं रखते थे. इसलिए नए राज्यों को लेकर उन्होंने अति उदार रुख अपनाया.
६. अमेरिका जैसा विकसित देश जिसकी जनसँख्या ३० करोड़ से भी कम है उस देश में ५० राज्य हैं..तो भारत जिसकी जनसँख्या लगभग १२५ करोड़ है यहाँ अभी तक सिर्फ २८ राज्य ही हैं. अर्थात अमेरिका की तुलना में ४ गुनी आबादी लेकिन राज्य लगभग आधे. अमेरिका का अधिक राज्यों के साथ विश्व की अग्रणी सैन्य,वैज्ञानिक एवं आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रतिस्थापित होना ये साबित करने हेतु एक पर्याप्त तर्क कहा जा सकता है कि राज्यों की अधिक संख्या कहीं से भी राष्ट्रीय विकास के मार्ग में बाधा नहीं पहुंचाती उलटे विकास एवं संवृद्धि हेतु प्रेरक ही साबित हुई है.
७. क्षेत्रीय भाषा एवं संस्कृति के उन्नयन तथा विकास में छोटे राज्य मददगार होते हैं.
८. क्षेत्रीय नेतृत्व क्षमता का विकास होता है. नए नेता राष्ट्रीय फलक पर अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर सकने हेतु मंच प्राप्त करते हैं.
९. क्षेत्रीय आवश्यकताओं को राष्ट्रीय नियोजन के साथ अनुकूलित किया जा सकता है एवं पंचवर्षीय योजनाओं में इन चिन्हित पिछड़े इलाकों के विकास हेतु उपयुक्त रणनीति का निर्माण किया जा सकता है.
१०. देश में अलगाववाद, नक्सलवाद, सांस्कृतिक टकराव, सामाजिक विभाजन जैसी ज्वलंत राजनीतिक समस्याओं का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है.
आदि...आदि....आदि.
१. स्थानीय निवासियों के जीवन को बेहतरीन बनाने और उन्हें विकास के समुचित अवसरों का लाभ उपलब्ध करवाने हेतु छोटे राज्यों का राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढ़ांचा अधिक अनुकूल होता है.
२. क्षेत्रीय संसाधनों का दक्षतापूर्वक एवं न्यायपूर्ण ढंग से इस तरह प्रयोग सुनिश्चित करना कि अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों एवं अनूसूचित जातियों/जनजातियों/आदिवासियों का अधिकतम दक्ष तरीके से विकास संभव हो पाए.
३. हमारे संविधान में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की जो परिकल्पना प्रस्तुत की गई है उसे यथार्थ के फलक पर अवतरित करने हेतु छोटे राज्य अधिक उपयुक्त रहते हैं. कहा भी जाता है-----''छोटा परिवार....सुखी परिवार'' हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी एक प्रसिद्ध उक्ति है----''दीर्घ सूत्रम शीघ्रम विनश्यति'' अर्थात लम्बी काया का क्षरण जल्दी हो जाता है. स्पष्ट होता है कि प्राचीन युग के ऋषि-मुनियों से लेकर वर्तमान वैज्ञानिक युग के दार्शनिक तक छोटी संरचना पर अधिक बल देते हैं जो छोटे राज्यों के निर्माण के पक्ष में एक महत्वपूर्ण तर्क के रूप में निरुपित किया जा सकता है.
४. भारत के संविधान में संघीय ढांचा अपनाया गया है जो एक साथ केंद्र व अनेक राज्यों वाली प्रशासनिक संरचनाओं की व्यवस्था करता है. संविधान की ७ वीं अनुसूची में संघ एवं राज्य के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है. भारत का संविधान केंद्र एवं राज्यों के बीच टकराव नहीं बल्कि सहयोग की बुनियाद पर टिका हुआ है. नए/छोटे राज्यों के निर्माते तो नए राज्यों के निर्माण हेतु प्रावधान ही क्यों रखते?? वो तत्कालीन समय उपस्थित राज्यों की संख्या कोण से सहयोग की संवैधानिक व्यवस्था घायल नहीं हो सकती क्योंकि इसके लिए हमारे संविधान में पर्याप्त उपाय किये गए हैं.
५. भारत के संविधान में नए/छोटे राज्यों के निर्माण की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई है. यदि हमारे विद्द्वान संविधान निर्माता नए राज्यों के गठन को अनुचित मान स्थिर भी तो रख सकते थे...अब प्रश्न उठता है आखिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? न सिर्फ नए राज्यों के निर्माण का प्रावधान संविधान में रखा बल्कि नए राज्य गठन की प्रक्रिया भी अति सरलीकृत बनाई गई..इसके लिए न तो किसी तरह के संविधान संशोधन की आवश्यकता होती है और न ही संसद के विशेष बहुमत की....स्पष्ट होता है कि हमारे संविधान निर्माता नए राज्यों को लेकर तनिक मात्र भी संशय नहीं रखते थे. इसलिए नए राज्यों को लेकर उन्होंने अति उदार रुख अपनाया.
६. अमेरिका जैसा विकसित देश जिसकी जनसँख्या ३० करोड़ से भी कम है उस देश में ५० राज्य हैं..तो भारत जिसकी जनसँख्या लगभग १२५ करोड़ है यहाँ अभी तक सिर्फ २८ राज्य ही हैं. अर्थात अमेरिका की तुलना में ४ गुनी आबादी लेकिन राज्य लगभग आधे. अमेरिका का अधिक राज्यों के साथ विश्व की अग्रणी सैन्य,वैज्ञानिक एवं आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रतिस्थापित होना ये साबित करने हेतु एक पर्याप्त तर्क कहा जा सकता है कि राज्यों की अधिक संख्या कहीं से भी राष्ट्रीय विकास के मार्ग में बाधा नहीं पहुंचाती उलटे विकास एवं संवृद्धि हेतु प्रेरक ही साबित हुई है.
७. क्षेत्रीय भाषा एवं संस्कृति के उन्नयन तथा विकास में छोटे राज्य मददगार होते हैं.
८. क्षेत्रीय नेतृत्व क्षमता का विकास होता है. नए नेता राष्ट्रीय फलक पर अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर सकने हेतु मंच प्राप्त करते हैं.
९. क्षेत्रीय आवश्यकताओं को राष्ट्रीय नियोजन के साथ अनुकूलित किया जा सकता है एवं पंचवर्षीय योजनाओं में इन चिन्हित पिछड़े इलाकों के विकास हेतु उपयुक्त रणनीति का निर्माण किया जा सकता है.
१०. देश में अलगाववाद, नक्सलवाद, सांस्कृतिक टकराव, सामाजिक विभाजन जैसी ज्वलंत राजनीतिक समस्याओं का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है.
आदि...आदि....आदि.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें