बुधवार, 28 अगस्त 2013

नए राज्यों का राष्ट्रीय हितों के परिप्रेक्ष्य में मूल्याँकन ----- भाग : २

देश की अवनति के पक्ष में ----
 

१. एक नए राज्य के बन जाने से देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे अनेक नए राज्यों के निर्माण की मांग जोर पकड़ने लगती है.

२. देश में आन्दोलन, विरोध और प्रदर्शन का अनवरत सिलसिला शुरू हो जाता है. कई बार ऐसे आन्दोलन हिंसक स्वरुप भी अख्तियार कर लेते हैं जिससे जान और माल की क्षति होती है.

३. राष्ट्रीय संपत्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया जाता है जिसकी प्रतिपूर्ति हेतु सरकार द्वारा आम जनता पर करों का बोझ डाल दिया जाता है. इससे गरीब जनता और गरीब होती जाती है.

४. कई बार ऐसे आन्दोलन जातीय हिंसा को बढ़ावा देते हैं जिससे कानून एवं व्यवस्था का ढाँचा बिखर जाता है और सर्वनाशी संकट का उद्भव होता है.

५. नागरिक, प्रदेश एवं राष्ट्र की आर्थिक प्रगति के अवसर अवरुद्ध हो जाते हैं. देश विकास की दौड़ में पिछड़ जाता है.इस तरह नए राज्यों का निर्माण देश की समावेशी संवृद्धि को प्रतिकूलत: प्रभावित करता है.

६. संसाधनों के दोहन हेतु क्षेत्रीय नेताओं,प्रशासकों,उद्द्योगपतियो
और माफियाओं की शैतान चौकड़ी नापाक गठबंधन बना लेती है और नए राज्य निर्माण से प्राप्त होने वाले सभी फायदे कब्ज़ा लेती है. मासूम और भोली भाली जनता पिछड़ी की पिछड़ी ही रह जाति है. अर्थात नए राज्य को लेकर उठने वाली मांग नए राज्य के अस्तित्व में आ जाने पर भी जस की तस ही बनी रहती है. प्रश्न उठता है---नए राज्य का लाभ जब देश को नहीं मिला...जनता को नहीं मिला....तो क्या माफियाओं के लाभ हेतु राज्य बनाए जाने चाहिए????

७. भारत के अधिकाँश राज्य आर्थिक रूप से पूर्ण सक्षम नहीं हैं. प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधन सीमित हैं. ऐसे में वर्तमान राज्यों का विभाजन सीमित संसाधनों का पुनर्वितरण ही करेगा न कि नए संसाधनों का सृजन. क्योंकि----''Resource making is not a cup of tea.'' नए राज्य के निर्माण पर नई विधान सभा,नया राज्य सचिवालय,नया उच्च न्यायालय, नया राज्य लोक सेवा आयोग जैसी कई नई संस्थाओं का निर्माण एक अपरिहार्य शर्त हो जाता है.इनके लिए विशाल भवनों के निर्माण एवं नए पदाधिकारियों की नियुक्ति जरूरी है जिसके लिए अपार धनराशि की आवश्यकता पड़ती है. यही धन अगर जनता के कल्याण पर खर्च किया जाए तो मूल राज्य में रहते हुए भी अधिक जनकल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है.

८. छत्तीसगढ़,झारखण्ड जैसे राज्य अपने मूल राज्यों से अलग होकर नए राज्यों के रूप में भले ही गठित हो गए हैं किन्तु यहाँ की जनता विकास की दौड़ में आज भी बहुत पिछड़ी अवस्था में बनी हुई है. भारत राज्य विकास सूचक के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि इन नव सृजित राज्यों को अलग अस्तित्व में आ जाने पर भी कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं हुआ है.

९. एक राज्य में अनेक भाषाई एवं सांस्कृतिक तत्व सदैव ही विद्दमान रहते हैं. अगर देश की गाड़ी को सुचारू रूप से संचालित करना है तो इन विविध तत्वों के बीच समायोजन ही एकमात्र उचित नीति कही जा सकती है न कि परस्पर विखंडन और पार्थक्य को बढ़ावा देने सम्बन्धी नीति.

१०. भारत की प्राचीन विरासत 'अनेकता में एकता' और 'वसुधैव कुटुंबकम' की है. अगर हमें अपने देश की इस महान परम्परा को आगामी पीढ़ियों तक संपृक्त करना है तो हमें साथ मिलकर रहना सीखना ही होगा.यही हमारे हित में है और यही राष्ट्र एवं समाज के हित में भी होगा.

आदि...आदि....आदि.

नए राज्यों का राष्ट्रीय हितों के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन-----भाग : १

देश की उन्नति के पक्ष में  ------

१. स्थानीय निवासियों के जीवन को बेहतरीन बनाने और उन्हें विकास के समुचित अवसरों का लाभ उपलब्ध करवाने  हेतु  छोटे राज्यों का राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढ़ांचा अधिक अनुकूल होता है.

२. क्षेत्रीय संसाधनों का दक्षतापूर्वक एवं न्यायपूर्ण ढंग से इस तरह प्रयोग सुनिश्चित करना कि अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों एवं अनूसूचित जातियों/जनजातियों/आदिवासियों का अधिकतम दक्ष तरीके से विकास संभव हो पाए.

३. हमारे संविधान में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की जो परिकल्पना प्रस्तुत की गई है उसे यथार्थ के फलक पर अवतरित करने हेतु छोटे राज्य अधिक उपयुक्त रहते हैं. कहा भी जाता है-----''छोटा परिवार....सुखी परिवार'' हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी एक प्रसिद्ध उक्ति है----''दीर्घ सूत्रम शीघ्रम विनश्यति'' अर्थात लम्बी काया का क्षरण जल्दी हो जाता है. स्पष्ट होता है कि प्राचीन युग के ऋषि-मुनियों से लेकर वर्तमान वैज्ञानिक युग के दार्शनिक तक छोटी संरचना पर अधिक बल देते हैं जो छोटे राज्यों के निर्माण के पक्ष में एक महत्वपूर्ण तर्क के रूप में निरुपित किया जा सकता है.

४. भारत के संविधान में संघीय ढांचा अपनाया गया है जो एक साथ केंद्र व अनेक राज्यों वाली प्रशासनिक संरचनाओं की व्यवस्था करता है. संविधान की ७ वीं अनुसूची में संघ एवं राज्य के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है. भारत का संविधान केंद्र एवं राज्यों के बीच टकराव नहीं बल्कि सहयोग की बुनियाद पर टिका हुआ है. नए/छोटे राज्यों के निर्माते तो नए राज्यों के निर्माण हेतु प्रावधान ही क्यों रखते?? वो तत्कालीन समय उपस्थित राज्यों की संख्या को
ण से सहयोग की संवैधानिक व्यवस्था घायल नहीं हो सकती क्योंकि इसके लिए हमारे संविधान में पर्याप्त उपाय किये गए हैं.

५. भारत के संविधान में नए/छोटे राज्यों के निर्माण की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई है. यदि हमारे विद्द्वान संविधान निर्माता नए राज्यों के गठन को अनुचित मान
स्थिर भी तो रख सकते थे...अब प्रश्न उठता है आखिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? न सिर्फ नए राज्यों के निर्माण का प्रावधान संविधान में रखा बल्कि नए राज्य गठन की प्रक्रिया भी अति सरलीकृत बनाई गई..इसके लिए न तो किसी तरह के संविधान संशोधन की आवश्यकता होती है और न ही संसद के विशेष बहुमत की....स्पष्ट होता है कि हमारे संविधान निर्माता नए राज्यों को लेकर तनिक मात्र भी संशय नहीं रखते थे. इसलिए नए राज्यों को लेकर उन्होंने अति उदार रुख अपनाया.

६. अमेरिका जैसा विकसित देश जिसकी जनसँख्या ३० करोड़ से भी कम है उस देश में ५० राज्य हैं..तो भारत जिसकी जनसँख्या लगभग १२५ करोड़ है यहाँ अभी तक सिर्फ २८ राज्य ही हैं. अर्थात अमेरिका की तुलना में ४ गुनी आबादी लेकिन राज्य लगभग आधे. अमेरिका का अधिक राज्यों के साथ विश्व की अग्रणी सैन्य,वैज्ञानिक एवं आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रतिस्थापित होना ये साबित करने हेतु एक पर्याप्त तर्क कहा जा सकता है कि राज्यों की अधिक संख्या कहीं से भी राष्ट्रीय विकास के मार्ग में बाधा नहीं पहुंचाती उलटे विकास एवं संवृद्धि हेतु प्रेरक ही साबित हुई है.

७. क्षेत्रीय भाषा एवं संस्कृति के उन्नयन तथा विकास में छोटे राज्य मददगार होते हैं.

८. क्षेत्रीय नेतृत्व क्षमता का विकास होता है. नए नेता राष्ट्रीय फलक पर अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर सकने हेतु मंच प्राप्त करते हैं.

९. क्षेत्रीय आवश्यकताओं को राष्ट्रीय नियोजन के साथ अनुकूलित किया जा सकता है एवं पंचवर्षीय योजनाओं में इन चिन्हित पिछड़े इलाकों के विकास हेतु उपयुक्त रणनीति का निर्माण किया जा सकता है.

१०. देश में अलगाववाद, नक्सलवाद, सांस्कृतिक टकराव, सामाजिक विभाजन जैसी ज्वलंत राजनीतिक समस्याओं का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है.

आदि...आदि....आदि.